Jaipur Farmer: अपनी मां को बचाने के लिए, किसानों ने ली जमीन के अंदर समाधि

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Jaipur Farmer: भूमि अधिग्रहण के खिलाफ कर रहे अांदोलन

Jaipur Farmer: हमारे देश के किसान भाई अपनी कृषि भूमि को मां के समान पूजते हैं . वह इतने नुकसान झेलने के बाद भी इसलिए खेती करते हैं, ताकि उनकी मां (कृषि भूमि) की सुंदरता बनी रहे और उस पर बंजर जमीन होने का कलंक न लगे.

मगर क्या हमारे देश की सरकारें यह बात समझती हैं? ये सवाल आज इसलिए जरूरी है क्योंकि देश केे किसानों की वर्तमान में जो हालात हैं वो काफी चिंताजनक बनें हुए हैं.
राजस्थान में किसानों ने लगाई भूमि समाधि
Jaipur Farmer: ताजा मामला राजस्थान के जयपुर से जुड़ा है जहां जयपुर विकास प्राधिकरण ने किसानों की खेतीहर भूमि पर कॉलोनी बनाने की योजना तैयार की है.
इस योजना को पूरा करने के लिए सरकार ने किसानों को उनकी जमीन खाली करने का आदेश जारी कर दिया है.
मगर ताज्जुब की बात तो यह है कि दर्जनों किसानों द्वारा अपनी भूमि देने से मना करने के बावजूद सरकार की तरफ से नोटिस थमाकर जल्द जमीन खाली करने की नसीहत दी गई है.
वहीं सरकार के इस रवैये से आक्रोशित किसानों ने साफ कहा दिया है कि वे अपनी खेती की जमीन छोड़ने वाले नहीं हैं. उनके लिए कृषि भूमि उनकी मां समान है और वे अपनी मां को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ सकते .
जिसके बाद से पीड़ित किसानों ने अपनी जमीन बचाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया है.इस आंदोलन में किसानों ने अपनी जमीन में ही गड्ढा खोदकर उसमें समाधि लगा ली है.
अपने इस आंदोलन को लेकर किसानों का कहना है कि अगर उनकी जमीन को जबरन छीना जाएगा, तो वे जमीन के अंदर ही दफन हो जाएंगे.
भला तो नहीं किया, बर्बाद जरूर कर डाला
सरकार के द्वारा जब किसानों के हित में भूमि अधिग्रहण बिल को लागू किया गया तो कहा गया कि इस बिल के आने के बाद से किसान भाई की जमीन को उसकी मर्जी के बिना अधिग्रहण नहीं किया जा सकता.
लेकिन आज सरकारें जिस तरह से किसानों को भूमि अधिग्रहण बिल के प्रावधानों का भय दिखाकर उनकी जमीन जबरन छीन रहीं है, वह किसानों के अधिकारों को कुचलने जैसा है.
100 साल पहले की किसान समस्या जस की तस
जब महात्मा गांधी ने 1917 में चंपारण आंदोलन की शुरूआत की थी, तो वो भी एक कृषि आंदोलन ही था. उस आंदोलन में भी किसानों के कर्जमाफी की समस्या मुख्य थी.
यह आंदोलन गांधी जी के नेतृत्व में पूरे देश में चला था
तब तो हुकूमत में अंग्रेज थे, लेकिन आज तो अपने हैं. मगर फिर भी समस्या वही है जो 100 साल पहले थी.
किसानों के कुछ मुख्य आंदोलन
कर्जमाफी व किसान लागत के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग को लेकर राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य-प्रदेश के किसानों का आंदोलन करीब एक माह तक चला.
27 अप्रैल 2017 को तमिलनाडु के किसानों ने शरीर में एक गमछा पहनकर और शरीर में नरकंकाल की माला पहनकर दिल्ली के जंतर-मंतर में 41 दिनों तक धरना दिया था. किसानों की मांग बस इतनी थी कि सरकार ने जो कोर्पोरेटिव बैकों से कर्ज माफ करने का वायदा किया है, उसे पूरा नहीं किया जा रहा है
15 अगस्त 2017 को महाराष्ट्र में किसानों ने स्वतंत्रता दिवस के दिन सड़कों पर आंदोलन किया था.
उनकी भी मांग कुछ यही थी कि सरकार ने उनके साथ वायदाखिलाफी की है. उनका कहना था कि महाराष्ट्र सरकार ने उनसे जून तक कर्जमाफी का वायदा किया था, लेकिन निर्धारित तिथि गुजर जाने के बाद भी मांग पूरी नहीं की जा रही है.
इस आंदोलन में पुलिस ने किसानों पर जमकर लाठीचार्ज भी किया था, जिसकी मीडिया में काफी आलोचना हुई थी.
1 जून 2017  मध्य प्रदेश में नोटबंदी के बाद नकदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देना, बिजली संकट की समस्या को लेकर किसानों का दस दिन तक आंदोलन चला था.
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