Kerala Agriculture Model : केरल का कृषि मॉडल मालदीव के किसानों का बना नया ब्रह्मास्त्र

Kerala Agriculture Model

Kerala Agriculture Model : सिविल इंजीनियर के कृषि दिमाग की वजह से हुआ मुम़किम

Kerala Agriculture Model : हाल के दिनों में भारत के युवाओं ने कृषि क्षेत्र में अपनी काबिलयत का लोहा मनवाते हुए दुनियाभर के देशों के लिए एक मिसाल बन कर उभरे हैं.

हमारे कृषि प्रधान देश के पास कई ऐसे नौजवान हैं जो किसानों की समृद्धि के लिए काम कर सकते है. मगर कई बार यह देखा गया है कि उन्हें देश के अंदर उस तरह का परिवेश नहीं मिल पाता हालांकि जहां मिलता है वहां भी वह खुद को साबित करने में बिलकुल पीछे नहीं रहते हैं.
केरल के पेरिंजनम के सिविल इंजीनियर ई.सी. मनोहरन 2013 में अपने साथियों के साथ सिविल इंजीनियरिंग से जुड़े कार्य करने के लिए मालदीव गए थे. वहां पर उनको वेटारू द्वीप पर एक नाव घर और टर्मिनल बनाने का काम करना था.
काम के दौरान मनोहरन ने वहां देखा की वत्तारू द्वीप की जलवायु स्थिति लगभग केरल के समान है. इसके बाद उन्होंने कृषि विश्वविद्यालय (केएयू) से तकनीकी सहायता लेते हुए वहां कुछ बीज लेकर खेती करने का प्रयास किया.
द्वीप में केरल जैसे खेती के पैटर्न और जलवायु पर गौर करते हुए, मनोहरन ने तय किया कि वह इससे अपने इलाके के किसानों की मदद कर सकते है.
उन्होंने वत्तारू के लोगों को आश्वस्त किया कि केरल से बीज और रोपण सामग्री लाना उनके लिए यूरोपीय देशों से लाए गए बीज की तुलना में अधिक उपयुक्त रहेगा.
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कृषि वैज्ञानिकों से अच्छे संपर्क आए काम
मालदीव के लोगों को पूरी तरह आश्वश्त करने के बाद मनोहरन ने केएयू के वैज्ञानिकों से मुलकात की और उनसे खेती  के लिए किस्में चयनित करने में मदद मांगी.
मालदीव में कृषि की कड़वी किस्म ‘प्रीती’ ने वहां बहुत अच्छे परिणाम दिए, और सबसे ज्यादा सफल वहां की तरबूज की खेती रही .
मनोहर ने जब पहली बार बीजरहित तरबूज की स्वर्ण और शोनीमा किस्मों के बारे में सुना तो उन्होंने टी प्रदीप कुमार से संपर्क किया, जिन्होंने इसे विकसित किया था. इसके बाद उन्होंने मालदीप के द्वीपों में उस बीज को ले जाने के लिए उन्हें मना लिया.
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केरल के तरबूज मालदीव में छाए
इन किस्मों से जहां केरल की सामान्य स्थितियों में केवल 3 किलोग्राम के फल का उत्पादन होता है, वहीं वत्तारू में 8 से 10 किलो के फल का उत्पादन हुआ. एक पर्यटन स्थल होने के कराण बीज रहित तरबूज वहां बहुत सफल रहे.
वहां उन तरबूजों की कीमत अब लगभग 120 किलोग्राम है जबकि केरल में तरबूज की औसत कीमत इसकी केवल एक तिहाई है.
तरबूज़ के अलावा वेट्टारू में उन्होंने घिया, बैंगन, और ककड़ी की खेती को भी बढ़ावा दिया. मालदीप के खेतों के 40 हेक्टेयर में अब इन बीजों से खेती होती है. लेकिन तरबूजों में जिस तरह का फायदा हुआ है वह किसी और से नहीं हुआ.

साभार – द हिंदू