इराक में मुस्लिम बच्चियों को खतना से कुछ यूं बचा रही ‘वादी’ की महिलाएं

Voice Against Muslim Girl Khatna
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Voice Against Muslim Girl Khatna : एनजीओ वादी की मदद से कुर्द में खतना की दरों में आई गिरावट 

Voice Against Muslim Girl Khatna :  मुस्लिम समुदाए में पुरूषों के खतना की प्रथा के बारे में तो आप सभी शायद अच्छे से परिचित होंगे, लेकिन शायद आप में से कम ही लोग होंगे जो ये जानते होंगे की मुस्लिम महिलाओं का भी खतना किया जाता है.

हालांकी मुस्लिम महिलाओं की खतना प्रथा अब सिर्फ दुनिया के कुछ ही हिस्सों में चल रही है, मगर फिर भी ये आज के समाज के लिए एक बड़ा चिंता का विषय है.
हाल ही में न्यूज एजेंसी भाषा ने इराक में इस प्रथा से दो बच्चियों को बचाने के लिए संर्घष कर रही एक महिला की कहानी को प्रकाशित किया है
इराक के कुर्द गांव में ठंड में काले बादलों और बारिश के आसार के बावजूद एक महिला घर के बंद दरवाजे के सामने खड़ी है.
वो वहां से बिल्कुल भी हिलने को तैयार नहीं है क्योंकी उसे डर है कि कहीं उसके जाने के बाद घर में रहने वाली महिलाएं अपनी दो बच्चियों का खतना ना कर दें.
35 वर्षीय रसूल जो की खुद बचपन में खतना का दंश झेल चुकी हैं घर के दरवाजे आवाज लगा रही हैं की ‘‘मुझे मालूम है कि आप घर में हैं. मुझे सिर्फ बात करनी है.’’.
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बता दें की रसूल इराक के कुर्द इलाके में महिलाओं/बच्चियों के खतने के खिलाफ अभियान चलाने वाली ‘वादी’ एनजीओ की कार्यकर्ता हैं.
वहीं के कुछ उदारवादी लोगों का मानना है की रसूल उनके इलाके में बच्चियों के लिए देवदूत जैसी हैं.
ऐसा इसलिए क्योंकी एक वक्त इराक के कुर्द इलाके में बच्चियों/महिलाओं के बीच खतना की परंपरा बड़ी सामान्य बात थी. आए दिन किसी ना किसी घर में बच्चों की इस प्रथा की वजह से चीख पुकार सामान्य बात थी.
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लेकिन ‘वादी’ के अभियान ने काफी हद तक इस संबंध में महिलाओं की सोच बदली है और अब पूरे इराक के मुकाबले कुर्द क्षेत्र में बच्चियों के खतने की संख्या में काफी कमी देखने को मिली है.
गौरतलब है की कुर्द वैसे तो महिलाओं के लिए प्रगतिशील क्षेत्र माना जाता है लेकिन यहां दशकों से खतना की परंपरा रही है.
तमाम अभियानों के बाद कुर्द प्राधिकार ने 2011 में खतने को घरेलू हिंसा कानून के तहत शामिल कर खतना करने वालों के लिए अधिकतम 3 साल की सजा और करीब 80,000 अमेरिकी डॉलर के जुर्माने का प्रावधान किया था.
इस वजह से रसूल है देवदूत
खबर के मुताबिक रसूल क्षेत्रीय राजधानी अरबिल के पूर्व में स्थित शरबती सगीरा गांव में खतने के खिलाफ जागरुकता फैलाने और इसे बंद कराने के लिए 25 बार जा चुकी हैं.
वो वहां गांव के इमाम की सोच बदलने का प्रयास कर रही जो खतने को इस्लाम से जोड़ कर देखते हैं.
इसके अलावा प्रशिक्षित दाईयों को खतने से होने वाले नुकसान, उसके कारण वर्षों तक होने वाले रक्तस्राव, संक्रमण के खतरों और मानसिक प्रताड़ना के संबंध में समझाती हैं.
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क्या है महिलाओं का खतना
इस प्रथा के तहत बच्चियों के भगशिश्निका (clitoris) को सुन्नत किया जाता है, इसमें बच्ची के हाथ-पैर मजबूती से पकड़े जाते हैं और इसके बाद बच्ची के शरीर के क्लीटोरिस भाग पर मुल्तानी मिट्टी लगाकर वह हिस्सा काट दिया जाता है.
खतना के बाद बच्चियां दर्द से कई महीनों तक जूझती रहती हैं, और कई की तो संक्रमण फैलने के कारण मौत भी हो जाती है.